श्री हरिवंश पुराण Text with English Translation

श्री हरिवंश पुराण  Text with English Translation
Product Code: ISBN 81-7081-652-1
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हरिवंश पुराण महाभारत का परिशिष्ट माना जाता है।  इसमें तीन बड़े पर्व हैं जिनमे १६३७४ पद्य हैं। 

इसका प्रथम पर्व हरिवंश पर्व कहलाता है।  इसी पर्व के आधार पर इसका नामकरण प्रतीत होता है।  पुराणों की तरह इसका भी प्रारंभ सृष्टि प्रक्रिया के वर्णन से होता है तथा सभी तरह के पुराण विषय इसमें पाए जाते हैं।  इनमे ध्रुव की कथा, दक्ष और उसकी पुत्रियों की कथा, दैत्यों तथा देवताओं की उत्पत्ति, वेद और यज्ञ के विरोधी वेन और पृथु की कथाएँ , विश्वामित्र तथा वशिष्ठ के आख्यान , सूर्यवंश के इक्ष्वाकु और उनके पितरों के प्रसंग , पितरों के श्राद्ध का विवरण , चंद्रवंश (जो अत्रि से प्रारम्भ हुआ) का वर्णन , पुरुरवा-उर्वशी कथा, नहुष और ययाति की कथाएं, यदु, वसुदेव तथा कृष्ण की कथाएं  प्रमुख हैं।

इसका दूसरा पर्व विष्णु पर्व नाम से प्रसिद्ध है। इसमें मानवरूपधारी विष्णु अर्थात कृष्ण की कथा कही गयी है. जन्म, बाल्यकाल, वीरतापूर्ण कर्म, कृष्ण के प्रेम व्यवहार का विस्तृत वर्णन है।  हरिवंश में वर्णित आख्यानों में कृष्ण कभी बड़े देवता तो कभी पूर्णतया मानव के रूप में भक्तों के आराध्य देव हैं।  साहित्य व इतिहास की दृष्टि से कृष्णा संबंधी आख्यान महत्त्वपूर्ण हैं. इसमें एक शैव प्रसंग तथा राम की  स्तुति भी है। विष्णु तथा शिव स्तोत्रों से परिपूर्ण होने के कारण हरिवंश एक धार्मिक कृति है

इसके तृतीय पर्व में संसार में आगे आने वाले युगों के विषय में भविष्यवाणी की गयी है।  इसीलिए इसका नाम भविष्य पर्व है।  यह अंश स्वयं में पूर्ण एवं स्वतंत्र काव्य है।  इसमें सृष्टि के दो भिन्न वर्णन, विष्णु के वराह , नरसिम्ह तथा वामन अवतारों की कथा है।  एक प्रसंग में शिव और विष्णु की पूजाओं में साम्य स्थापित करने की प्रवृत्ति है  जिसमे शिव एवं विष्णु एक दूसरे की स्तुति करते हैं।  इसमें हरिवंश में वर्णित विषयों का सारांश तथा पुराण श्रवण के पुण्य की गणना भी है।

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